चाइना कब्रिस्तान: भारत-चीन की साझी विरासत संभालने में चीन बढ़ाएगा हाथ

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रामगढ़। भारत-चीन की साझी विरासत संभालने में चाइना हाथ बढ़ाएगा। डोकलाम विवाद के बाद सुनने में यह थोड़ा अजीब जरूर लगता है लेकिन है पूरी तरह सही। देश के झारखंड प्रदेश में रामगढ़ जिला का चाइना कब्रिस्तान अभी भी दोनों देशों के रिश्तों की डोर संभाले हुए है। सीमा पर दोनों देशों में चाहे कितनी भी तना-तनी क्यों नहीं हो, रामगढ़ आकर चाइना-भारत के साथ कदमताल करने की बात ही कहता है।

शुक्रवार को भी कौसिंल जनरल ऑफ पुपिल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना मा जानवू ने रामगढ़ जिले के बरकाकाना में स्थित चाइना कब्रिस्तान का पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की बात कही।चाइना कब्रिस्तान भारत-चीन गणराज्य के मैत्री संबंध का ऐतिहासिक गवाह है। यह कब्रिस्तान द्वितीय विश्व युद्ध में शहीद चाइनीज सैनिकों की स्मृतियां को संजोए हुए है। सालोभर चाइनीज और ताइवान के लोग अपनों की याद में चाइना कब्रिस्तान पहुंचते है। शुक्रवार को कौसिंल जनरल ऑफ पुपिल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना मा जानवू, कौंसिल मिस सुलुनली, मिस्टर यूजीन साउ शहीद योद्धाओं को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। श्री मा जानवू ने कहा कि चाइना कब्रिस्तान ऐतिहासिक स्थल है। इसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। चाइनीज सैनिक के क्रबों को आकर्षक बनाया जाएगा। रिसोर्ट, लाइब्रेरी, म्युजियम आदि बनाए जाएंगे। सालोभर चाइनीज और ताइवान के लोग आते-जाते रहेंगे। इसके लिए भारत सरकार से बातचीत हो चुकी है।

चाइना कब्रिस्तान सालोभर आमलोगों के लिए खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि यह समाधि चाइनीज वीरों के स्थायी स्थान है। जिन्होंने चीन-भारत सार्वजनिक मार्ग के साझा निर्माण में अंग्रेजो और अमेरिका सेना के साथ एकजुट होकर काम करते हुए अपने जीवन का बलिदान देकर अमर हो गए। इस तरह उन्होंने जापानी फौज भारत में कब्जा नहीं जमा सके। पांच सदस्यी टीम ने शहीद स्मारक और क्रबों में पुष्पांजिल अर्पित कर श्रद्धाजंलि दी। इसके बाद बौद्ध मठ में अपनों की याद में कैंडल जलाकर कब्र में दफन सैनिकों के आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा-अर्चना किया।

द्वितीय विश्व युद्ध की स्मृति है चाइना कब्रिस्तान

द्वितीय विश्व युद्ध 18 मार्च 1942 से मार्च 1945 के बीच हुआ। इसका स्मृतियां रामगढ़ जिला से महज तीन किमी दूर बुजूर्ग जमीरा के समीप चाइना कब्रिस्तान के रूप में आज भी विद्यमान है। पूरे भारत में रामगढ़ के अलावे अरूणाचल प्रदेश और असम में भी इस युद्ध के स्मृतियां मौजूद है।

इतिहास के आइना में चाइना कब्रिस्तान

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान पूरे एशिया में एकक्षत्र राज स्थापित करना चाहता था। इसके लिए उसने इटली और जर्मनी के साथ मिलकर त्रिगुट का गठन किया था। संयुक्त रूप से एशिया के महाभारत क्षेत्र को अपने कब्जे में लेने के लिए युद्ध किया था। उस समय यह क्षेत्र अंगे्रजी हुकूमत के अधीन था। अंग्रजों के मदद के लिए ताइवान सरकार ने एक लाख सैनिको का जत्था भारत भेजा था। जिसमें 60 हजार सैनिक और चिकित्सक, इंजीनियर, कूक और मजदूर शामिल थे। युद्धोपरांत रामगढ़ में चाइना कब्रिस्तान के रूप में 7 एकड़ भूमि में स्थापित किया गया। सन् 1983 नये रूप में बिग्रेडियर एससी पूरी ने चाइना कब्रिस्तान का उद्घाटन किया था। इस कब्रिस्तान में युद्ध में शहीद योद्धाओं का स्थायी कब्रगाह बनाया गया था। कब्रिस्तान के बीचोबीच ताइवान के राजा चोंग काई शेख का 30 फुट लंबा बड़ा स्मृति स्मारक है।

चाइना कब्रिस्तान में 620 योद्धाओं का है कब्र

कब्रिस्तान परिसर में द्वितीय विश्व युद्ध में शहिद कुल 620 शहिदों को दफनाया गया था। जिसमें 573 कब्र योद्धाओं के है। 40 सैनिकों को बाद में दफनाया गया। 5 सैनिकों को गुप्त सूचना दुश्मन सेना को देने के कारण कोर्ट मार्शल किया गया था। इसे भी यहीं दफनाया गया था। इस परिसर में दो शहिद भारतीय सेना के कब्र भी है।

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