वेंकैया नायडू ही क्यों?

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बीजेपी ने संघ परिवार के करीबी वेंकैया नायडू को एनडीए का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है। इसकी अटकलें लंबे समय से थीं कि पार्टी इस पद के लिए वेंकैया नायडू का नाम आगे कर सकती है। सोमवार को ये अटकलें सही साबित हुईं। लेकिन नायडू ही क्यों? यह ऐसा सवाल है, जो कइयों के मन में उठ रहा होगा। दरअसल, मोदी इस पद के लिए ऐसा कैंडिडेट चाहते थे जिसे संसदीय कार्य में महारत हासिल हो और साथ ही उसके विपक्षी दलों के साथ जिसके अच्छे संबंध हों। नायडू इस पैमाने पर बिल्कुल फिट थे। अगर वह उपराष्ट्रपति चुन लिए जाते हैं तो ऐसा पहली दफा होगा जब देश के तीन बड़े संवैधानिक पदों- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पर बीजेपी नेता होंगे।
नायडू के सभी दलों से अच्छे संबध
नायडू अपनी हाजिरजवाबी के लिए मशहूर हैं। नायडू ने संसदीय मामलों के मंत्री के तौर पर कांग्रेस सहित सभी दलों के साथ अच्छे संबंध बनाए थे। वह गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (GST) बिल पर विपक्ष का समर्थन मांगने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के घर पर भी गए थे। वह राष्ट्रपति चुनाव के सिलसिले में भी सोनिया से मिले थे। विपक्षी दलों के साथ उनके अच्छे संबंधों के कारण उन्हें राज्यसभा का कामकाज बेहतर तरीके से चलाने में मदद मिलेगी। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एनडीए को राज्यसभा में 2019 तक बहुमत मिलने की संभावना नहीं है।
दक्षिण भारत में पार्टी का विस्तार
इसके अलावा एक दक्षिण भारतीय को उपराष्ट्रपति बनाने को बीजेपी की दक्षिण भारतीय राज्यों में लोकप्रियता बढ़ाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। नायडू ने 2016 के चुनाव के दौरान तमिलनाडु में सक्रियता से प्रचार किया था। वह कर्नाटक और केरल भी गए थे। उन्होंने खासतौर पर तमिलनाडु में केंद्र की योजनाओं को लागू करने के तरीके में काफी दिलचस्पी ली है। नायडू दक्षिण भारत से जुड़े मामलों पर भी अपनी राय रखते रहे हैं। उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी को लागू करने के विवाद में क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता देने का समर्थन किया था, लेकिन इसके साथ ही उन लोगों को चेतावनी दी थी कि राजनीतिक फायदे के लिए हिंदी का विरोध करते हैं।
ABVP से राष्ट्रीय राजनीतिक तक का सफर
नायडू ने क्षमताओं को कई मौकों पर साबित भी किया है। आंध्र प्रदेश से आने वाले नायडू ने 1967 में बतौर युवा छात्र नेता एबीवीपी से जुड़े और 1973 में उन्होंने जन संघ जॉइन किया। यहां से उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष और फिर केंद्रीय मंत्री बनने तक का सफर तय किया। नायडू जब दिल्ली आए तो एलके आडवाणी की नजर उन पर पड़ी। धीरे-धीरे वह टीम आडवाणी का एक अहम हिस्सा बन गए। नायडू के मीडिया से भी बेहद अच्छे संबंध रहे। पत्रकारों में उनकी अच्छी पैठ है। दिल्ली आने के शुरुआती दिनों में उनकी कोशिश रहती थी कि भले ही मीडिया में पार्टी को लेकर कोई नकारात्मक वक्तव्य ही छपे, मगर कहीं ना कहीं पार्टी चर्चा में जरूर रहनी चाहिए।

पीएम उम्मीदवारी पर मोदी के समर्थन
टीम आडवाणी में सुषमा, जेटली, अनंत कुमार और प्रमोद महाजन जैसे नेताओं के साथ नायडू का भी कद बढ़ता गया और धीरे-धीरे वह राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन गए। नायडू ने इस वक्त तक भले ही दो विधानसभा चुनाव जीत लिए थे, मगर उनकी जमीनी स्तर पर पकड़ उतनी मजबूत नहीं थी। एक वक्त तक आडवाणी के विश्वासपात्र रहे नायडू, मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के समय आडवाणी के विरोधी खेमे में भी दिखाई दिए। मोदी की पीएम पद की दावेदारी के वक्त पार्टी के अंदर उनके समर्थकों में से एक प्रमुख चेहरा वह भी थे।
कई बार बने संकटमोचक
नायडू को सरकार के संकटमोचक के तौर पर भी जाना जाता है। कई बड़े मुद्दों पर उन्होंने संसद में विपक्ष पर मजाकिया अंदाज में तंज कसे। जब विपक्ष सरकार पर हमलावर हुआ, तो कई दफा नायडू ने आगे आकर विपक्ष को अपने तीखे और कभी-कभी मजाकिया लहजे से शांत कराने का काम किया। अगर नायडू उपराष्ट्रपति बनते हैं, तो 10 साल बाद किसी राजनीतिक शख्सियत की इस पद पर वापसी होगी। बतौर उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के तौर पर उनके सामने कई चुनौतियां भी होंगी।

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