धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद हमारा राष्ट्रीय स्वभाव

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– निर्मल रानी –
आजकल यदि आप टेलीविज़न पर समाचार सुनने बैठें या समाचार पत्रों-पत्रिकाओं पर नज़र डालें तो एक बार तो ऐसा प्रतीत होगा गोया पूरे देश में सांप्रदायिकता व जातिवाद की आग सी लगी हुई है। जहां हमारे समाज में सांप्रदायिकतावादी व जातिवादी राजनीति करने वालों का एक ‘राजनैतिक गिरोह’ देश की भोली-भाली जनता को वरगला कर अपना उल्लू सीधा करने में लगा हुआ है और ऐसे लोगों की कोशिशों के परिणामस्वरूप ही देश में कहीं न कहीं सांप्रदायिक व जातिवाद आधारित घटनाएं होती रहती हैं। इन घटनाओं में कहीं किसी की हत्या की खबर आती है तो कहीं पीडि़त परिवार के घरों में आग लगा कर जान व माल के नुकसान पहुंचने की खबरें सुनाई देती हैं। नतीजतन ऐसी घटनाओं के बाद धर्म या जाति आधारित ध्रुवीकरण होता है और ऐसे मामलों को उकसाने व भडक़ाने वाले साजि़शकर्ता इसका लाभ उठाते हैं। परंतु इसी सिलसिले की एक महत्वपूर्ण कड़ी यह भी है कि हमारे देश का बिकाऊ,पक्षपाती व अपने व्यवसायिक लाभ कमाने के लिए महज़ अपनी टीआरपी बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित होने वााला मीडिया इन्हीं घटनाओं को कुछ इस प्रकार से चीख-चिल्लाकर पेश करता है गोया इस प्रकार की तनावपूर्ण स्थिति किसी एक जगह नहीं बल्कि पूरे देश में पैदा हो गई है या हो रही है। आजकल समाचार वाचकों तथा टीवी ऐंकर्स ने कार्यक्रम को पेश करने का एक अजीब-ो-गरीब आक्रामक अंदाज़ अिख्तयार किया हुआ है। उनका यह अंदाज़ ही अपने-आप में भडक़ाऊ व आग लगाऊ सा प्रतीत होता है। हालांकि देश् की जनता को बिना चीखे-चिल्लाए और बिना टेबल ठोके हुए भी एंकर या समाचार वाचक की हर बात उसी तरह समझ आएगी जैसी वह बताना चाह रहा है।

परंतु अफसोस तो इस बात का है कि जहां यह पक्षपाती व भडक़ाऊ मीडिया गाय,लव जिहाद,एंटी रोमियो स्कवॉयड तथा देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में चल रहे राजनैतिक मंथन अथवा द्वंद्व को चीख-चिल्ला कर पेश करता है वहीं इसी मीडिया की देश में प्रतिदिन घटित होने वाली ऐसी हज़ारों-लाखों घटनाओं या दिनचर्यायों पर नज़र क्यों नहीं जाती जो आए दिन स्वयं चीख-चीख कर यह बता रही हों कि हमारा देश और यहां के आम नागरिकों का स्वभाव वास्तव में धर्मनिरपेक्ष एवं उदारवादी है। हमारे देश में जहां मलिक मोहम्मद जायसी,रहीम और रसखन जैसे कवियों ने सैकड़ों वर्ष पूर्व हिंदू देवी-देवताओं की स्मृति में तथा उनकी प्रशंसा में ऐसे नायाब भजन,दोहे व कसीदे लिखे जो रहती दुनिया तक यादगार रहेंगे। वहीं आज भी इसी देश के बहुसंख्य हिंदू तथा सिख समाज के लोग उसी सद्भावना,सम्मान तथा नेकनीयती के साथ देश की अनेकानेक दरगाहों,खानकाहों व इमाम बारगाहों में पूरी श्रद्धा तथा विश्वास के साथ जाते रहते हैं और अपनी आस्था के फूल चढ़ाते हैं। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज दिल्ली से लेकर हरियाणा,पंजाब,हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर में कई दरगाहें या पीरों-फकीरों के मकबरे ऐसे हैं जिनमें कोई गैर मुस्लिम अर्थात् हिंदू या सिख समाज का व्यक्ति गद्दीनशीन या मुतवल्ली बनकर उस धर्मस्थल पर 24 घंटे अपनी सेवाएं दे रहा है।

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भारत-पाक विभाजन के बाद भले ही पाकिस्तान में मौजूद अनेक प्राचीन मंदिर आज अपने भक्तों के अभाव में वीरान क्यों न पड़े हों या उनकी प्राचीन रौनक व आभा मद्धिम पड़ गई हो परंतु भारत मे 1947 से पहले की आबाद अनेक प्राचीन दरगाहें व खानक़ाहें आज भी अपनी रौनक बरकरार रखे हुए हैं बल्कि उनमें कुछ न कुछ इज़ाफा ही हुआ है। गौरतलब है कि विभाजन के बाद जब बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग हरियाणा व पंजाब से पाकिस्तान चले गए तो यहां बची पीर-फकीरों की दरगाहों की हिफाज़त करने तथा उसकी मान-मर्यादा व गौरव को बचाए रखने का काम यहां का हिंदू व सिख समाज ही पूरी श्रद्धा व लगन के साथ करता आ रहा है। हरियाणा के ऐतिहासिक नगर पानीपत में ऐसी ही एक प्रसिद्ध प्राचीन पवित्र दरगाह को हज़रत अबूशाह क़लंदर की दरगाह के नाम से जाना जाता है। हालांकि इस दरगाह के मुत्तवल्ली मुस्लिम समुदाय के ज़रूर हैं परंतु दरगाह में उनके तौर-तरीके व उनकी गतिविधियों को देखकर ऐसा कतई प्रतीत नहीं होता कि वे किसी ऐसी कट्टरता या जड़ता के शिकार हैं जैसेकि अन्य कई मौलवी रूपी लोग देखे जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे देश में मौलवियों का एक वर्ग ऐसा भी है जो महिलाओं के दरगाह में प्रवेश करने को गैरइस्लामी या गैर मुनासिब समझता है। इसी प्रकार कुछ मौलवीनुमा लोग ऐसे भी हैं जो महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के तथा महिलाओं के मस्जिद में नमाज़ अदा करने के विरोधी हैं। परंतु पानी पत की क़लंदरी दरगाह में आपको किसी तरह का कोई प्रतिबंध देखने को नहीं मिलेगा।

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पिछले दिनों चंडीगढ़ के राम दरबार के गद्दीनशीन शहज़ादा पप्पू सरकार जो स्वयं गैर मुस्लिम समुदाय से हैं तथा राम दरबार की बाबा सखी चंद व अम्मी हुज़ूर की गद्दी के वारिस हैं अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान पानीपत की अबु शाह क़लंदर दरगाह में अपने दर्जनों अनुयाईयों के साथ पधारे। उनके साथ अधिकांशत: हिंदू व सिख समाज के सदस्य थे। इनमें काफी महिलाएं भी थीं। पप्पू सरकार जब भी अपने अमेरिका दौरे पर जाते हैं उस समय वे नियमित रूप से इस दरगाह में अपने साथियों सहित अपनी श्रद्धा के फूल एक चादर के रूप में चढ़ाते हैं। पप्पू सरकार दरगाह में बैठकर पूरे भाव विभोर होकर अपने साथियों सहित नात व कव्वालियां सुनते हैं तथा उनके सभी साथी भी इस दरगाह में गहन श्रद्धा व आस्था का प्रदर्शन करते देखे जा सकते हैं। जब पप्पू सरकार लगभग एक घंटा इस पवित्र दरगाह में बिताने के बाद दिल्ली एयरपोर्ट के लिए दरगाह से निकलने लगे उस समय दरगाह के गद्दीनशीन मौलवी साहब ने अपने विशेष मेहमान कक्ष में पप्पू सरकार तथा उनके सभी हिंदू व सिख साथियों तथा समस्त महिलाओं को बड़े हीआदर व सम्मान के साथ बिठाया। सभी को जलपान कराकर समस्त मेहमानों को सिरोपा भेंट किया। जिस समय मौलवी साहब पुरुषों के अतिरिक्त हिंदू व सिख महिलाओं के गले में सिरोपा डालकर आशीर्वाद दे रहे थे तथा महिलाएं गद्दीनशीन मौलवी साहब के पैर छूकर आशीर्वाद ले रही थंीं उस समय भारत का धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद तथा सर्वधर्म संभाव का वास्तविक स्वरूप सिर चढक़र बोल रहा था। हालांकि उस समय वह कथित मौलवी भी याद आ रहे थे जो दरगाह हाजी अली में औरतों को जाने से रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देना चाहते थे।

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बहरहाल, पानीपत की दरगाह जैसी घटनाएं पूरे देश में प्रतिदिन कहीं न कहीं घटित होती रहती हैं। देश की अधिकांश मस्जिदों की सीढिय़ों पर अपने बीमार बच्चों पर झाड़-फूंक करवाने के लिए लाखों गैर मुस्लिम लोग नमाजि़यों के मस्जिद से बाहर निकलने के इंतज़ार में खड़े रहते हैं। परंतु बड़े अफसोस की बात है कि रहीम,रसखान और जायसी के इस देश में सर्वघर्म संभाव की इस महान विरासत की रक्षा करने वाली ऐसी दिनचर्याओं का जि़क्र हमारे देश का भडक़ाऊ व आग लगाऊ मीडिया नहीं कर पाता। परंतु नकारात्मक खबरों या घटनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर या चिल्ला-चिल्ला कर पेश करने में उसकी पूरी दिलचस्पी रहती है। इन सबके बावजूद सुखद यही है कि हमारा राष्ट्रीय स्वभाव धर्मनिरपेक्ष व उदारवादी था है और हमेशा रहेगा।

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