पंचतत्व में विलीन हुई शासन श्री साध्वी श्री नगीना जी

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मुंबईः सोमवार को भायंदर में शासन श्री साध्वी नगीना जी का संथारा पूर्वक देवलोकगमन के पश्चात् सुबह करीब साढ़े दस बजे भायंदर सभा भवन से बैकुंठ यात्रा निकाली गई।  इस यात्रा में सैकड़ो की संख्या में श्रावक समाज की उपस्थिति रही। करीब दस किलोमीटर की इस यात्रा में लोग साध्वी श्री की अंतिम झलक पाने के लिए लालायित दिखाई दिए।  हर किसी की आँखे नम थी पर इस बात की ख़ुशी थी की जिस उद्देश्य और संकल्प के साथ साधु जीवन शासन श्री ने व्यापन किया उसी तरह से संथारा पूर्वक उनका देवलोकगमन भी हुआ। उनकी सिखाई हुई बाते उनका मार्गदर्शन लोगों के बिच हमेशा रहेगा। उन्होंने अपनी अमृत वाणी के माध्यम से लोगो के दिलों में जो स्थान बनाया था वो कभी दूसरा नहीं हाशिल कर पायेगा। यही वजह थी की अंतिम यात्रा के इस पावन अवसर पर उनके अनुयायियों की भीड़ सी उमड़ पड़ी थी।  तेज बारिश के बावजूद लोग शासन श्री का साथ छोड़ने को तैयार न थे। जब तक उनका शरीर पंचतत्व में विलीन नहीं हो गया श्रावक समाज उनसे दूर नहीं  गया। वैसे भी वो शरीर से उन के बिच नहीं रही पर उनका मार्गदर्शन उनकी प्रेरणा हमेशा लोगों के दिलो में रहेगी। इस अवसर पर धर्मसंघ की सभी सभा संस्थाओ से पदाधिकारियों की उपस्थिति रही।
गौरतलब है कि तेरापंथ धर्म संघ की विद्वान साध्वी शासनश्री नगीनाश्री जी का रविवार, 16 जुलाई को भायंदर स्थित तेरापंथ भवन में देवलोकगमन हो गया था । उन्होंने कुछ ही समय के संथारा उपरांत 8 बजकर 28 मिनट पर अंतिम सांस ली  थी। उनके देवलोकगमन पर संपूर्ण तेरापंथ समाज हतप्रभ है। उल्लेखनीय है कि 5 जुलाई को साध्वी श्री ने विहार कर भायंदर तेरापंथ भवन में चातुर्मास प्रवेश किया था। उनके देवलोकगमन की खबर सुनने के बाद मुंबई तेरापंथ समाज के श्रावक-श्राविका एवं विभिन्न क्षेत्रों के पदाधिकारी साध्वी श्री के अंतिम दर्शन हेतु भायंदर तेरापंथ भवन पहुंचने लगे थे। यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा। जानकारी के अनुसार साध्वी श्री इन दिनों अस्वस्थ थीं, लेकिन अंतिम समय तक वे श्रावक-श्राविकाओं को धर्म प्रभावना कर रही थीं। उनके देवलोकगमन पर समाज के पदाधिकारियों ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए दिवंगत आत्मा की उत्तरोत्तर प्रगति की कामना की है।
हाल ही में आचार्य श्री महाश्रमण एवं साध्वी प्रमुखा कनक प्रभा जी ने शासनश्री साध्वी नगीना श्री द्वारा लिखित  नवप्रकाशित पुस्तक अध्यात्म एवं विज्ञान का समीक्षात्मक अनुशीलन का प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान विमोचन किया था। साध्वी श्री अपने अंतिम समय तक सक्रिय रहीं जिसका लाभ आध्यात्मिक व साहित्यिक रूप से संपूर्ण तेरापंथ समाज को प्राप्त हो रहा था।  साध्वी श्री का जन्म 5 मई 1932 को राजस्थान के टाडगढ़ में हुआ था तथा आचार्य श्री तुलसी के सान्निध्य में 1948 में आपने दीक्षा प्राप्त कर धर्मसंघ की सेवा के लिए संयम पथ पर अग्रसर हो गई थीं। आपने बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पांडुचेरी, दिल्ली आदि राज्यों की यात्राएं करके वहां के लोगों को धर्मलाभ से लाभान्वित कर चुकी थीं। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं, जो उनकी अनुपस्थिति में संपूर्ण समाज को लाभान्वित करता रहेगा।

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