जीवन को आग नहीं, बाग बनावे: चन्द्राननसागरसूरी

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राष्ट्रसंत आचार्य श्री चन्द्राननसागरसूरीश्वरजी म.सा. ने गौडीजी पार्श्वनाथ जिनालय के प्रांगण में अपनी प्रवचन वाणी में प्रेरणा देते हुए बताया कि मनुष्य जीवन जो मिला है उसको आग नहीं बाग बनाओ। जीवन को बाग बनाने के लिए अन्तःकरण के आइने की सफाई करने की जरूरत है। जब अन्तःकरण का आइना साफ हो जाएगा तो न केवल बादशाही मिलेंगी अपितु परमात्मा की भी प्राप्ति होगी। जीवन में केवल पैसा छोड देना और उसे दान मान लेना ही काफी नहीं है इसके अलावा राग, द्वेष, क्रोधाग्नि, जिद्द और आग्रह का त्याग करोगे तो ही परमात्मा का अनुग्रह मिलेगा। जीवन में दिन-रात के, जन्म के, चातुर्मास के कुछ कर्तव्य है उन कर्तव्यों का पालन करना शुरू करोगे तो निश्चय जीवन बाग बन जाएगा। आज के समय में बहुत से श्रावक – श्राविका हृदय गति, कैंसर या दुर्घटना वश अल्पायु में ही संसार छोड जाते है कहीं न कहीं उनके पुण्याई में कमी दिखती है जबकि उसी परिवार में उम्र का शतक पूरा कर चुके बुजुर्ग जीवित है यानि उनकी पुण्याई बहुत हद तक ज्यादा है, उनसे सीखने की जरूरत है।
जीवन में हमेशा अच्छे काम करने जाओगे तो विघ्नों का सामना होगा ठीक उसी तरह जिस तरह जौहरी के पास सौना बेचने जाओ तो जौहरी यह जानते हुए भी कि वह सौना है फिर भी उसे कसौटी पर घिसकर उसकी परख करता है और अगर पीतल को बेचने जाओ तो कोई परख नही करता। ठीक उसी तरह यदि आपके जीवन में भी विघ्नों का सामना हो और अगर आपके पास परमात्मा के प्रति भावना से की गई भक्ति हो तो चाहें जितनी कसौटी की जाए आप भी सौना बनकर ही उभरोंगे।
नवकार का महत्व बताते हुए गुरूदेव श्री ने बताया कि जिस तरह आटे से रोटी बनती है उसको तेल में तलों तो पूरी बनती है और वहीं आटे को घी में सेककर शक्कर डालो तो हलवा बनता है ठीक उसी तरह नवकार का अलग-अलग विधिपूर्वक जाप करो तो जीवन में आने वाले हर तरह के विघ्नों का निवारण किया जा सकता है।
चतुर्विध संघ के महत्व को बताते हुए पूज्य श्री ने बताया कि साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका से ही चतुर्विध कहलाता है और अगर चारों में से एक भी तकलीफ में हो तो संघ का संचालन मुश्किल होता है। ठीक उसी तरह जिस तरह शरीर का एक भी अंग काम न करें तो शरीर नहीं चल सकता। जीवन को बाग बनाने के लिए सभी प्रेरणाओं पर चिंतन और मनन करे।

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