बिहार के उपचुनाव में नीतीश का दांव!

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तीन सीटों के उपचुनाव से अपने को अलग किया है। जदयू नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार ने रणनीतिक रूप से अररिया लोकसभा सीट पर अपना दावा छोड़ा है। वे चाहते तो सीट पर दावेदारी कर सकते थे। पिछले चुनाव में इस सीट पर भाजपा दूसरे स्थान पर और जदयू तीसरे स्थान पर रही थी पर दोनों के वोटों में ज्यादा अंतर नहीं था। इस बार नीतीश को लग रहा है कि वह सीट सहानुभूति के कारण राजद के खाते में जाएगी। अगर दिवंगत सांसद मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम जदयू से लड़ने को तैयार होते तो नीतीश जरूर इस सीट पर दावा करते।

इसी तरह जहानाबाद विधानसभा सीट को लेकर भी ऐस लग रहा है कि नीतीश ने पहले से मन बनाया हुआ था कि वे इस पर दावा नहीं करेंगे। वैसे भी उनको पता है कि राजद के दिग्गज नेता मुद्रिका सिंह यादव के निधन से खाली हुई यह सीट जीतना बहुत मुश्किल है। बहरहाल,  जानकार सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी उनसे मिलने गए थे और नीतीश के घर पर उनकी खूब आवभगत हुई थी। पुराने विवाद भूल कर दोनों बड़े प्रेम से मिले थे। कहा जा रहा है कि उस समय इस सीट को लेकर चर्चा हुई थी। इस इलाके में मांझी का पुराना असर है। सो, वे अपनी पार्टी के लिए यह सीट मांग रहे हैं। अब इस बारे में फैसला भाजपा को करना है।  मांझी ने ऐलान किया है कि अगर उनको जहानाबाद सीट नहीं मिलती है तो वे अलग होने की घोषणा कर सकते हैं। यहीं पर कहा जा रहा है कि नीतीश कोई मास्टर स्ट्रोक चल सकते हैं। कहा जा रहा है कि वे मांझी की बेटे को विधान परिषद की एक सीट दे सकते हैं। जैसे उन्होंने पिछले दिनों भाजपा के साथ गठबंधन में लौटने के बाद रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस को दी थी। इससे दलितों में उनके प्रति सद्भाव बनेगा और यह भी संभव है कि मांझी अपनी पार्टी का विलय जनता दल यू में कर दें। अगर मांझी उनके साथ आते हैं और कांग्रेस के दलित नेता अशोक चौधरी भी पाला बदल कर जदयू से जुड़ते हैं तो नीतीश का अतिपिछड़ा, दलित और महादलित का समीकरण मजबूत होगा।