आम आदमी से ‘खास आदमी’ तक सिमटकर रह गई है AAP!

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नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी में कई चहेरे थे जिन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता था, लेकिन पार्टी ने तीन ऐसे सदस्यों को राज्यसभा भेजा जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। पार्टी के इस कदम से यह सवाल उठने लगा है कि क्या पार्टी अब एक ‘खास आदमी’ और उसके फैसलों तक सिमट गई है।
2015 में राजधानी में बंपर बहुमत के साथ सरकार बनाने के बाद आप ने पंजाब से 4 सांसद लोकसभा भेजे और बाद में पंजाब विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। पार्टी भले ही राजनीतिक दृष्टि से मजबूत हो रही है लेकिन पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का हाल का फैसला पार्टी में भूचाल-सा ले आया है। सीएम केजरीवाल ने राज्यसभा के मामले में अपने नेताओं को नजरअंदाज कर बाहरियों पर भरोसा दिखाया। पूर्व कांग्रेस नेता सुशील गुप्ता और चार्टर्ड अकाउंटेंट एनडी गुप्ता को राज्यसभा के लिए चुना पार्टी में अदरूनी कलह को बढ़ाता नजर आ रहा है।
2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उभरी ‘आप’ आज अपनी ही पार्टी के सदस्यों से दूरी का सामना कर रही है। पार्टी के संस्थापक सदस्यों योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के दूर हुई पार्टी ने राज्यसभा भेजने के लिए पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया टीएस ठाकुर जैसे जाने-माने नामों को लाने की कोशिश की। और अंत में कुमार विश्वास, आशुतोष और आशीष खेतान जैसे अपने ही नेताओं को नजरअंदाज कर दिया। आइए जानें, आम आदमी पार्टी ने हाल में किस-किस से किया किनारा।
कुमार विश्वास
पंजाब और दिल्ली निकाय चुनावों में हार के बाद से वरिष्ठ आप नेता कुमार विश्वास और सीएम अरविंद केजरीवाल के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। केजरीवाल खेमा हार का जिम्मेदार विश्वास को ठहराते हुए यह आरोप लगाने लगा कि वह दिल्ली के पूर्व विधायकों के नजदीकी हैं। विश्वास को राजस्थान का प्रभारी बना दिया गया और जानबूझकर पार्टी ने राजस्थान से दूरी बना ली, जबकि वहां इस साल चुनाव हो सकते हैं। सीएम केजरीवाल के साथ विश्वास की निष्ठा पर भी सवाल उठने लगे। ऐसा कहा जा रहा है कि इसी वजह से उन्हें राज्यसभा की रेस से बाहर कर दिया गया।
आशुतोष
सीएम केजरीवाल के प्रमुख सहयोगियों-साथियों में से एक हैं आशुतोष। आशुतोष को पंजाब चुनावों के लिए फंड इकट्ठा करने का जिम्मा सौंपा गया था लेकिन जैसे ही सीएम केजरीवाल का उन्हें राज्यसभा की रेस से बाहर बताया, उनके समर्थक भावुक हो गए और कुछ समय बाद ही ऐसी खबरें आने लगीं कि आशुतोष ने खुद ऑफर ठुकराया।
आशीष खेतान
राज्यसभा सीट के लिए प्रमुख दावेदारों में एक थे आशीष खेतान, जो पत्रकार रह चुके हैं। आशीष कभी भूषण खेमे के करीबी माने जाते थे और बाद में उन्हें सीएमओ का अडवाइजर बना दिया गया। हालांकि खेतान पार्टी के ज्यादातर मामलों से दूर रहते हैं। उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और गोपाल राय सीएम के ज्यादा करीबी माने जाते हैं, हर मुद्दे पर इनकी राय अहम होती है।
अन्य
2014 लोकसभा चुनावों के करीब एक साल बाद पंजाब से 4 सांसदों को लोकसभा भेजने के बाद पार्टी नेतृत्व ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत सांसद दलजीत सिंह को बाहर कर दिया। इसके बाद पार्टी टिकटों के लिए रिश्वत लेने के आरोपों के चलते सुचा सिंह छोटेपुर को भी बाहर का रास्ता दिखा गया गया। बाद में छोटेपुर ने दूसरी पार्टी बनाई जिसका खामियाजा आप को मालवा और दोआबा इलाकों में वोटों के नुकसान के रूप में उठाना पड़ा। फरवरी 2015 में आप की शानदार जीत के बाद पार्टी में दरार की पहली झलक मार्च के महीने में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के बाहर निकलने के साथ दिखाई दी। मयंक गांधी ने एक ब्लॉग लिखा, जिसमें कहा गया कि पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि जब तक प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव कोर टीम का हिस्सा रहेंगे, वह संयजोक नहीं रहेंगे। बाद में मयंक गांधी और अंजलि दमानिया ने भी पार्टी छोड़ दी थी।
अन्ना हजारे
सीएम अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी का गठन करने के लिेए साल 2012 में ही अन्ना हजारे का साथ छोड़ दिया था। साल 2013 में दिल्ली में चुनाव होने थे। 2016 में हजारे और उनके समर्थकों ने आप की फंडिंग में गड़बड़ी का मुद्दा भी उठाया था।